पटना में उस वक्त सियासी हलचल तेज हो गई जब नेता प्रतिपक्ष ने बिहार सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि राज्य का खजाना खाली हो चुका है। उन्होंने दावा किया कि सरकार के पास कर्मचारियों, मंत्रियों और विधायकों तक को समय पर वेतन देने के पैसे नहीं हैं। उनके इस बयान ने राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है।

तेजस्वी यादव ने ‘डबल इंजन’ सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि बिहार में गरीबी, बेरोजगारी और पलायन चरम पर है, लेकिन केंद्र से कोई विशेष सहायता नहीं मिल रही। उन्होंने यह भी कहा कि प्रति व्यक्ति आय के मामले में बिहार अब भी सबसे पीछे है।

विशेषज्ञों का मानना है कि चुनावी वादों और मुफ्त योजनाओं का राज्य के खजाने पर दबाव बढ़ रहा है। बिहार में कैश ट्रांसफर, मुफ्त बिजली और सब्सिडी जैसी योजनाओं पर करीब 40,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ा है। वित्त वर्ष 2026-27 का बजट बड़ा जरूर है, लेकिन उसमें वेतन, पेंशन और ब्याज जैसे अनिवार्य खर्च पहले ही भारी हिस्सेदारी ले लेते हैं।

राजस्व की स्थिति भी चुनौतीपूर्ण दिख रही है। 2025-26 में जीएसटी और गैर-जीएसटी संग्रह लक्ष्य से कम रहा। पेट्रोलियम और इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी से आय में भी गिरावट दर्ज की गई है। वहीं, बालू घाटों के लाइसेंस सरेंडर होने से करीब 600 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।

अर्थशास्त्रियों के अनुसार, कई राज्यों की तरह बिहार पर भी चुनावी घोषणाओं का वित्तीय बोझ बढ़ रहा है, जिससे कर्ज का दबाव बढ़ सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बिहार पर जीडीपी के मुकाबले कर्ज 36-37% तक पहुंच चुका है।

हालांकि सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है। वित्त मंत्री ने कहा कि राज्य में वेतन और पेंशन भुगतान में कोई समस्या नहीं है। वहीं ने तेजस्वी के बयान को राजनीतिक बताया।

फिलहाल, आंकड़े और बयानबाजी दोनों ही यह संकेत दे रहे हैं कि बिहार की वित्तीय स्थिति एक बड़ा राजनीतिक और आर्थिक मुद्दा बनने जा रही है।

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