शेरघाटी से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो सरकारी दावों की हकीकत को उजागर करती है। वंचित और दलित छात्रों के बेहतर भविष्य के लिए बनाया गया अंबेडकर छात्रावास आज बदहाली का शिकार है। करोड़ों की लागत से बनी यह इमारत वर्षों से बंद पड़ी है और अब खंडहर में तब्दील हो चुकी है। हैरानी की बात यह है कि इस छात्रावास की स्थिति की जानकारी जिला प्रशासन तक को नहीं थी, जो सीधे तौर पर निगरानी व्यवस्था की पोल खोलती है।

बिहार सरकार के एससी-एसटी कल्याण मंत्री लखेंद्र पासवान जब औचक निरीक्षण के लिए शेरघाटी पहुंचे, तो छात्रावास में ताला लटका मिला। मौके पर ही अधिकारियों को बुलाकर ताला खुलवाया गया। अंदर का दृश्य देखकर मंत्री भी हैरान रह गए। टूटी छत, जर्जर दीवारें, गंदगी का अंबार और पूरी तरह से उजड़ी व्यवस्था—हर तरफ लापरवाही की कहानी बयां कर रही थी।

 

निरीक्षण के दौरान मंत्री ने अनुमंडलीय कल्याण पदाधिकारी अमल किशोर को जमकर फटकार लगाई और 24 घंटे के भीतर जवाब तलब किया।

स्थानीय लोगों का कहना है कि इस छात्रावास में 50 से 100 गरीब और वंचित छात्र रहकर अपनी पढ़ाई कर सकते थे और अपने भविष्य को संवार सकते थे। लेकिन वर्षों से बंद पड़े इस भवन ने उनके सपनों को अधूरा छोड़ दिया।

 

सरकार जहां शिक्षा और कल्याण की बड़ी-बड़ी योजनाओं का दावा करती है, वहीं जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इस लापरवाही का जिम्मेदार कौन है?

 

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस मामले में संबंधित अधिकारियों पर ठोस कार्रवाई होगी और क्या यह छात्रावास दोबारा शुरू हो पाएगा, या फिर यह भी सिर्फ एक और सरकारी वादा बनकर रह जाएगा।

 

 

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