बिहार के स्थित ‘शिल्प ग्राम’ आज महिला सशक्तिकरण और पारंपरिक कला का अनूठा उदाहरण बनकर उभरा है। यहां हर सुबह 12-15 महिलाएं एक नई उम्मीद के साथ काम पर पहुंचती हैं। वे केवल मूर्तियों को रंगने या अंतिम रूप देने का काम नहीं करतीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की मिसाल भी पेश कर रही हैं।

श्रीजल, रेखा देवी, मीना कुमारी और सावित्री देवी जैसी महिलाएं सुबह 9 बजे से शाम 5:30 बजे तक मेहनत करती हैं। ये महिलाएं रोजाना करीब 100 प्रतिमाओं को तैयार करती हैं और हर महीने लगभग 4500 रुपये कमाकर अपने परिवार को सहयोग दे रही हैं। भले ही यह आमदनी कम लगे, लेकिन उनके लिए यह आत्मनिर्भर बनने की मजबूत शुरुआत है।

इस पहल के पीछे मूर्तिकार सुनील गोस्वामी का बड़ा योगदान है, जो वर्ष 2010 से भगवान बुद्ध और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बना रहे हैं। और के पास स्थित यह शिल्प ग्राम आज अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुका है।

यहां बनी भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक हैं, बल्कि इतिहास और कला का संगम भी हैं। 20 रुपये से लेकर 2.5 लाख रुपये तक की इन प्रतिमाओं की मांग देश ही नहीं, बल्कि जापान, थाईलैंड और म्यांमार जैसे बौद्ध देशों में भी है।

सुनील गोस्वामी के बेटे सृजल गोस्वामी ने इस पारंपरिक व्यवसाय को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ा है। अब ऑर्डर फोन और व्हाट्सएप के जरिए लिए जाते हैं, जिससे कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। यहां प्लास्टर ऑफ पेरिस, मार्बल डस्ट और फॉक्स मार्बल से बनी प्रतिमाएं उपलब्ध हैं, जिनमें फॉक्स मार्बल की मूर्तियां सबसे ज्यादा आकर्षक और टिकाऊ मानी जाती हैं।

‘शिल्प ग्राम’ आज ‘वोकल फॉर लोकल’ का जीवंत उदाहरण है, जहां परंपरा और आधुनिकता का संगम न सिर्फ कला को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के जीवन में भी सकारात्मक बदलाव ला रहा है।

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