बिहार के सरकारी स्कूलों में नामांकन प्रक्रिया को लेकर बड़ा बदलाव किया गया है। अब छात्रों का एडमिशन उनकी उम्र के आधार पर ही तय किया जाएगा। पहले कई स्कूलों में अभिभावकों की इच्छा, शिक्षक की सहमति या सीट की उपलब्धता के अनुसार बच्चों को किसी भी कक्षा में दाखिला दे दिया जाता था, जिससे एक ही कक्षा में अलग-अलग उम्र के बच्चे पढ़ते थे। नई व्यवस्था में इस पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है।

शिक्षा विभाग की नई गाइडलाइन के अनुसार कक्षा 1 में प्रवेश के लिए न्यूनतम उम्र 5 वर्ष तय की गई है, जबकि कक्षा 12 तक अधिकतम उम्र 19 वर्ष होगी। विभाग ने प्रत्येक कक्षा के लिए आयु सीमा निर्धारित की है। उदाहरण के तौर पर 5–8 वर्ष के बच्चे पहली, 6–9 वर्ष के दूसरी, 7–10 वर्ष के तीसरी और इसी तरह क्रमशः 16–19 वर्ष के छात्र 12वीं कक्षा में नामांकित होंगे।

इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य कक्षाओं में एकरूपता लाना है। अभी तक खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में 10–12 साल के बच्चे भी शुरुआती कक्षाओं में देखे जाते थे, जिससे शिक्षण प्रक्रिया प्रभावित होती थी। छोटे बच्चों के साथ बड़े बच्चों के बैठने से पढ़ाई का स्तर संतुलित करना शिक्षकों के लिए मुश्किल हो जाता था। अब समान आयु वर्ग के बच्चे साथ पढ़ेंगे, जिससे सीखने का माहौल बेहतर होगा।

नई नीति से स्कूल ट्रांसफर भी आसान होगा। एक समान व्यवस्था लागू होने से किसी भी छात्र का दूसरे स्कूल या राज्य में एडमिशन उसकी उम्र के अनुसार आसानी से हो सकेगा। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इससे टीचिंग क्वालिटी में सुधार आएगा, क्योंकि शिक्षक एक ही आयु समूह के अनुसार पढ़ा सकेंगे।

इसके अलावा, अधिक उम्र वाले लेकिन कमजोर छात्रों को पीछे रोकने के बजाय उनकी उम्र के अनुसार उचित कक्षा में एडमिशन दिया जाएगा। शिक्षा मंत्री सुनील कुमार के अनुसार, इससे बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ेगा और ड्रॉपआउट दर कम होगी। विभाग को उम्मीद है कि यह नई व्यवस्था शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में अहम भूमिका निभाएगी।

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