इन दिनों क्लस्टर बमों को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ गई है। हाल ही में ईरान द्वारा बैलिस्टिक मिसाइलों के जरिए इजराइल पर किए गए हमलों में क्लस्टर वॉरहेड के इस्तेमाल की खबरें सामने आई हैं। इन हमलों में इजराइल का एयर डिफेंस सिस्टम कई मामलों में इन्हें रोकने में सफल नहीं रहा, जिससे कुछ इलाकों में भारी तबाही देखी गई।
क्लस्टर बम एक खास तरह का हथियार होता है, जिसमें एक बड़े विस्फोटक की जगह कई छोटे-छोटे बम भरे होते हैं। मिसाइल के लक्ष्य के करीब पहुंचते ही इसका बाहरी हिस्सा खुल जाता है और ये छोटे बम बड़े इलाके में फैल जाते हैं। एक मिसाइल में 20 से लेकर 80 तक छोटे बम हो सकते हैं, जो जमीन पर गिरकर अलग-अलग जगहों पर विस्फोट करते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह तकनीक पारंपरिक रक्षा प्रणालियों को चुनौती देती है, क्योंकि एक मिसाइल कई लक्ष्यों में बदल जाती है। इससे एयर डिफेंस सिस्टम के लिए सभी खतरों को एक साथ रोक पाना मुश्किल हो जाता है।
क्लस्टर बमों को “एरिया वेपन” माना जाता है, यानी इनका असर बड़े इलाके में होता है। इनका इस्तेमाल अक्सर बिखरे हुए सैन्य ठिकानों, वाहनों या रनवे को निशाना बनाने के लिए किया जाता है। लेकिन इनका सबसे बड़ा खतरा आम नागरिकों के लिए होता है।
इन छोटे बमों में से 10 से 40 प्रतिशत तक कई बार फटते नहीं हैं, जिन्हें “डड्स” कहा जाता है। ये सालों तक जमीन में दबे रह सकते हैं और बाद में किसी भी समय विस्फोट कर सकते हैं, जिससे खासकर बच्चों और आम लोगों के लिए खतरा बना रहता है।
संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, क्लस्टर बमों से होने वाली मौतों में अधिकांश पीड़ित आम नागरिक होते हैं। इसी वजह से 2008 में एक अंतरराष्ट्रीय संधि बनाई गई, जिसमें 100 से अधिक देशों ने इनके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया।
इतिहास गवाह है कि द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर लाओस, अफगानिस्तान, इराक और लेबनान तक इन हथियारों का व्यापक इस्तेमाल हुआ है, जिसके दुष्परिणाम आज भी सामने आ रहे हैं। यही कारण है कि क्लस्टर बम आज भी दुनिया के सबसे विवादित और खतरनाक हथियारों में गिने जाते हैं।
