मोतिहारी के पूर्वी हिमाचल प्रदेश के रघुनाथपुर खंड में आज विकास के वाद्ययंत्रों के गवाह बन रहे हैं। करीब 20 साल पहले छैलाहा पहेली से बालगंगा को जोड़ने वाले पुल का सपना दिखाया गया था, लेकिन यह सपना आज से भी दूर है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस पुल के बनने से हजारों लोगों की जिंदगी आसान हो जाती थी। लेकिन वर्षों से उद्यम में यह योजना अब सरकारी प्रतिस्पर्धा का प्रतीक बन गई है। ग्राम पंचायत यादव जैसे ग्रामीण आज भी सवाल कर रहे हैं कि उनके गांव के विकास के दस्तावेज में क्या शामिल है या नहीं। उनका कहना है कि आये दिन लोग नदी पार करते समय विक्षिप्तों का शिकार हो जाते हैं, और कई लोगों की जान भी जा जाती है।
पुल नहीं होने की वजह से लोग हर दिन 22 किलोमीटर की दूरी तय करते हैं और खतरनाक यात्रा करते हैं। इसका सबसे ज्यादा असर बच्चों, महिलाओं और किसानों पर पड़ रहा है। बच्चों की पढ़ाई बाधित हो रही है, बीमार लोगों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता है, और किसानों की फसल बाजार तक की ताकत-पहुंचते उपयुक्त हो जाती है।
स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि रिस्टीच ने खुद को लगभग 2 लाख रुपये की लागत से एक ‘लचका पुल’ बना लिया। हालाँकि, हर साल मधुमेह में यह पुल बह जाता है और लोगों की मेहनत और अलगाव दोनों टूट जाते हैं। शंकर पासवान का कहना है कि आख़िर कब तक लोग इस जुगाड़ पर अड़े रहेंगे।
यह पुल सिर्फ एक रास्ता नहीं है, बल्कि सपही, बलही, मजार, मटवा, खगहनी, छलाहा और दहयिता कश्मीर जैसे करीब 10 हजार लोगों के विकास की कुंजी है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार की नई राह खुल सकती है।
हर चुनाव में यह नीलामी होती है, लेकिन चुनाव खत्म होने के साथ-साथ वादे भी खत्म हो जाते हैं। अब क्रांति की गंभीरता टूट रही है और वे आंदोलन की तैयारी में हैं। प्रश्न यही है—क्या यह पुल कभी बनेगा, या फिर यह सपना यूं ही अधूरा रह जाएगा?
