बिहार की राजनीति में पिछले तीन दशकों से दो बड़े नाम छाए रहे हैं- प्रसाद यादव और नीतीश कुमार लेकिन अब राजनीति नई पीढ़ी की ओर बढ़ रही है। आने वाले 2029 और 2030 के चुनावी मुकाबले में इन दिग्गजों के बेटे तेजस्वी यादव और निशांत कुमार को बीच पर देख सकते हैं।

तेज तर्रार यादव पिछले दशक से राजनीति में सक्रिय हैं। 2015 में डिप्टी सीएम बने, कई बार नेता प्रतिपक्ष रहे और लगातार स्थिर राजनीति का चेहरा रहे। उनके करीबी यादव- मुस्लिम वोट बैंक का मजबूत आधार हैं और वे एक प्रभावशाली वक्ता के रूप में उभरे हैं। हालाँकि, उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती उनके पिता के शासनकाल में ‘जंगलराज’ और भ्रष्टाचार के आरोप हैं। साथ ही, अलोकप्रिय सिद्धांतों में अभिनय की उम्मीद नहीं की जा रही है।

दूसरी ओर, निशांत कुमार राजनीति में नए खिलाड़ी हैं। अभी तक उनकी कोई बड़ी राजनीतिक भूमिका नहीं देखी जा रही है, लेकिन उनके नामांकन में भविष्य के नेतृत्व के लिए अहम भूमिका देखी जा रही है। उनके पक्ष में सबसे बड़ा फैक्टर नीतीश कुमार की ‘सुशासन’ छवि वाली है। साफा-सुथरी, इंजीनियरिंग की पढ़ाई और छवि से दूरी उन्हें मजबूत बनाती है, लेकिन अनुभव की कमी और सीमित जातीय आधार उनके लिए चुनौती है।

राजनीतिक सिद्धांतों का मानना ​​है कि युवाओं की ताकत और झुकाव जनता के सामने स्पष्ट हैं, जबकि निशांत अभी भी ‘अनछुए’ नेता हैं। ऐसे में शुरुआती दौर में उन्हें सहानुभूति और उम्मीद का फायदा मिल सकता है। हालाँकि, रियल मार्केटप्लेसेस मैदान में ही होगी।

आंकड़ों पर नजर डालें तो 2020 में सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, लेकिन 2025 में उनका प्रदर्शन 25 खण्डों तक चला गया। कहाँ-कहाँ से 85 लॉबीस्ट वापसी की यात्रा। आम आदमी पार्टी में भी लैपटॉप से ​​​​आगे है।

कुल मिलाकर, बिहार की नैतिकता अब विरासत की लड़ाई बन रही है—अनुभव बनाम नई छवि। 2029-30 के चुनाव तय करेंगे कि जनता किसे अपना नेता चुनेगी।

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