पटना: केंद्र के नेतृत्व वाली सरकार में महिलाओं की राजनीति में 33% बदलाव की दिशा में बड़ा कदम उठाने की तैयारी है। प्रस्तावित संशोधन के तहत विपक्ष और राज्य विधानसभाओं में हर तीन में से एक सीट महिलाओं के लिए होगी। सरकार का लक्ष्य 2029 आम चुनाव से पहले यह व्यवस्था लागू हो रही है।
इस बदलाव के बाद देश की नागरिकता में महिलाओं की भागीदारी में तेजी से बढ़ोतरी। वर्तमान में 543 वर्जिन पैरिशमन के बाद लगभग 816 हो सकते हैं, जिनमें करीब 273 शामिल हैं। बिहार में भी सबसे पहले 40 से लेकर 60 तक का प्रदर्शन होता है, जिसमें 20 से अधिक महिलाओं के लिए प्रवेश हो सकता है।
बिहार विधानसभा की तस्वीर भी बदलने वाली है। अभी 243 फ्लोरेंस वाले क्षेत्र का आकार लगभग 365 हो सकता है, जिसमें 122 फ्लोरेंस महिलाओं के लिए शामिल है। इस तरह के मंत्री पद में भी महिलाओं की भागीदारी और करीब 20 महिलाओं की नियुक्ति की संभावना बनी हुई है।
हालाँकि अभी भी स्थिति अलग है। 2025 के विधानसभा चुनाव में केवल 29 महिलाएं ही बेघर हुईं, जिनकी कुल संख्या लगभग 12% है। वहीं, बिहार में सिर्फ 5 महिलाएं ही अल्पसंख्यक हैं। राजनीतिक द्वारा टिकट वितरण में भी महिलाओं को प्राय: कम प्राथमिकता दी जाती है।
विशेषज्ञ का मानना है कि महिला न केवल महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में जातीयता लागू होती है, बल्कि उनका मुद्दा भी बेरोजगारी से जुड़ जाता है। यह परिवर्तन संगठनों को संगठन और टिकट वितरण में भी महिलाओं को अधिक अवसर देने के लिए मजबूर करता है।
महिला नटखट का विचार नया नहीं है। पहली बार 1996 में यह बिल पेश किया गया था, लेकिन अलग-अलग चीजें सामने नहीं आ सकीं। अब सरकार ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ में संशोधन कर इसे लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
बिहार में सबसे पहले पंचायत स्तर पर 50% महिला समानता लागू की गई है, जिसमें महिलाओं की भागीदारी में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। अब अगर यह कानून लागू होता है तो राज्य और देश की राजनीति में महिलाओं की भूमिका और मजबूत होगी।
