सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों में लैंगिक भेदभाव से जुड़े एक अहम मुद्दे पर सुनवाई का फैसला सुनाया है। मामला इस सवाल से जुड़ा है कि किसी पारसी महिला से दूसरे धर्म में विवाह करने के बाद उसकी धार्मिक पहचान और अधिकार से क्या संबंध बनाया जा सकता है।
मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने इस मामले में सुनवाई की। उपज की ओर से पुराने कट्टरपंथियों ने नागपुर पारसी पंचायत के संविधान के नियम 5(2) को चुनौती दी, जिसमें उन्होंने भेदभाव पूर्ण बताया।
समीक्षा के दौरान दर्शन ने कहा कि यह समुदाय में लंबे समय से विवाद का कारण बना हुआ है। उन्होंने तर्क दिया कि यह नियम विशेष रूप से नागपुर के अग्यारी (पारसी अग्नि मंदिर) में संचालित होता है और महिलाओं को प्रवेश देता है। इस पर प्रियंका ने कहा कि इस मामले में महत्वपूर्ण कानूनी सवाल शामिल हैं और नोटिस जारी किए जाएंगे।
यह दस्तावेज़ तैयार किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, नागपुर पारसी पंचायत, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय, महाराष्ट्र सरकार और चैरिटी कमिश्नर को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
याचिका में दावा किया गया है कि इन नियमों का उल्लंघन किया गया है।
मुख्य आरोप यह है कि गैर-पारसी से विवाह करने पर पारसी महिलाओं को उनकी धार्मिक पहचान और अग्यारी में प्रवेश के अधिकार से वंचित किया जाता है, जबकि पारसी पुरुषों पर ऐसा कोई प्रतिबंध लागू नहीं होता है। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस सूचक और महत्वपूर्ण मुद्दे पर विस्तृत सूची बनाई है, जिसमें भविष्य में धार्मिक गुरुओं में लैंगिक समानता की दिशा तय हो सकती है।
