बिहार केवल एक राज्य नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और ज्ञान की पवित्र धरती है। यही वह भूमि है जहां माता सीता की स्मृतियां जीवंत हैं, जहां भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त कर दुनिया को शांति का मार्ग दिखाया और भगवान महावीर ने अहिंसा का संदेश दिया था। इसी मिट्टी ने आचार्य चाणक और महर्षि वाल्मिकी जैसे महान मनीषियों का जन्म दिया, इसी तरह की मिट्टी आज भी विश्व का मार्गदर्शन करती है।
22 मार्च 1912 को बिहार में इस वर्ष 114 वर्ष पूरे हुए। इस लंबी यात्रा में एक दौर ऐसा भी आया जब ‘बिहारी’ शब्द का इस्तेमाल ताने के रूप में किया गया, लेकिन आज यही पहचान सम्मान का प्रतीक बन गई है।
‘ब्लड मैन’ कहे जाने वाले ‘मुकेश मुक़ूश हिरतिया’ इस बदलाव के उदाहरण हैं। 1981 से स्थिरांक कर वे हजारों लोगों की जान बचा चुके हैं। वे कहते हैं कि बिहार की सबसे बड़ी परंपरा यहां की सामाजिक और ‘हम’ की भावना है।
वहीं, उद्योगपति जगजीवन सिंह ने भी बिहार में अपना अगरबत्ती उद्योग स्थापित कर राज्य का नाम रोशन किया। उनका मानना है कि बिहार में औद्योगिक क्रांति की तुलना में बेहतर उद्योग और सस्ते दर मजबूत हुए हैं।
उन्नत चिकित्सक डॉ. सत्यजीत सिंह, 18 साल से लंदन में सेवा देने के बाद बिहार लौटे छोटे अस्पताल की शुरुआत, आज 400 बेड के बड़े संस्थान का संचालन कर रहे हैं। उन्होंने राज्य में रोबोटिक सर्जरी और ट्रांसप्लांट जैसी उन्नत तकनीकों को स्वास्थ्य क्षेत्र में नई पहचान बनाना शुरू कर दिया है।
सीनियर फेलो डेवलपमेंट वैभव के अनुसार, विकसित भारत का सपना विकसित बिहार के बिना अधूरा है। वे कहते हैं कि बिहार को फिर से ज्ञान और उद्यमिता का केंद्र बनाया जाएगा।
आज जरूरत है कि जाति और संप्रदाय से ऊपर उभरते युवा उद्यम और नवाचार की दिशा में आगे बढ़ें। समूह से ही बिहार फिर से अपना गौरवशाली पहचान हासिल कर सकता है।
