भागलपुर। अमर शहीद तिलका मांझी की जयंती के अवसर पर मारवाड़ी महाविद्यालय, भागलपुर के इतिहास विभाग द्वारा एक दिवसीय सेमिनार का सफल आयोजन किया गया। सेमिनार का विषय था— “अमर शहीद तिलका मांझी : आज़ादी के प्रथम जनजातीय वीर योद्धा”। कार्यक्रम का उद्देश्य राष्ट्रीय आंदोलन के प्रेरणास्रोत के रूप में तिलका मांझी के योगदान को रेखांकित करना तथा आदिवासी समाज में जागरूकता फैलाना था।
इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. प्रभात कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि तिलका मांझी ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध सबसे पहले संगठित प्रतिरोध की नींव रखी। अध्यक्षीय भाषण में प्राचार्य प्रो. (डॉ.) संजय कुमार झा ने तिलका मांझी के जीवन, संघर्ष और बलिदान पर प्रकाश डालते हुए विद्यार्थियों से उनके आदर्शों को आत्मसात करने का आह्वान किया।
मुख्य वक्ता टी.एन.बी. कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. रविशंकर कुमार चौधरी ने कहा कि यद्यपि 1857 के विद्रोह को पहला स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है, परंतु उससे लगभग 80 वर्ष पूर्व ही तिलका मांझी ने बिहार के जंगलों में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष की पहली चिंगारी जलाई थी। उन्होंने कहा कि तिलका मांझी को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम क्रांतिकारी कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। डॉ. चौधरी ने बताया कि लेखिका महाश्वेता देवी ने उनके जीवन पर ‘शालगिरर डाके’ तथा राकेश कुमार सिंह ने ‘हुल पहाड़िया’ उपन्यास में उनके संघर्ष का उल्लेख किया है।
तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी 1750 को सुल्तानगंज के तिलकपुर गांव में एक संथाल परिवार में हुआ था। उनका वास्तविक नाम जबरा पहाड़िया था। 1770 के भीषण अकाल के दौरान उन्होंने अंग्रेजी खजाना लूटकर गरीबों में वितरित किया, जिससे वनवासी समाज में विद्रोह की चेतना जागृत हुई।
कार्यक्रम के अंत में सहायक प्राध्यापक अक्षय रंजन ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर विभिन्न विभागों के अध्यक्षों, शिक्षकों एवं सैकड़ों छात्र-छात्राओं की उपस्थिति रही। छात्र हृषिकेश प्रकाश ने सेमिनार को ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायी बताया। सभी ने तिलका मांझी के साहस और बलिदान को नमन करते हुए उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लिया।
