नालंदा जिले के चंडी थाना क्षेत्र अंतर्गत गंगौरा पंचायत का ढकनिया गांव आज पूरे बिहार के लिए सामाजिक एकता और स्व-अनुशासन की अनोखी मिसाल बन चुका है। लगभग 3000 की आबादी वाला यह गांव पिछले 50-60 वर्षों से एक ऐसे फैसले पर अडिग है, जो इसे बाकी गांवों से अलग पहचान देता है। यहां किसी भी घर में बकरी नहीं पाली जाती और गांव पूरी तरह नशामुक्त है।

 

ग्रामीणों के अनुसार, दशकों पहले बकरियां अक्सर बंधन खोलकर छूट जाती थीं और पड़ोसियों की फसलों को नुकसान पहुंचाती थीं। इससे गांव में आए दिन विवाद और झगड़े होते थे। बढ़ते तनाव को देखते हुए बुजुर्गों ने बैठक बुलाकर सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि गांव में कोई भी व्यक्ति, चाहे वह अमीर हो या गरीब, बकरी नहीं पालेगा। यह नियम पीढ़ी दर पीढ़ी सख्ती से लागू है और नई पीढ़ी भी इसे पूरी निष्ठा से निभा रही है।

 

ढकनिया गांव की एक और बड़ी खासियत है—नशामुक्ति। बिहार में शराबबंदी कानून लागू होने से कई साल पहले ही इस गांव ने शराब और ताड़ी पर पूरी तरह रोक लगा दी थी। गांव में दर्जनों ताड़ के पेड़ मौजूद हैं, लेकिन उनसे ताड़ी नहीं उतारी जाती। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों पहले एक परिवार ताड़ी बेचता था, जिससे बाहरी लोग गांव में आते और माहौल बिगड़ता था। विवाद बढ़ने पर ग्रामीणों ने सामूहिक निर्णय लेकर उस गतिविधि को बंद कराया। तब से लेकर आज तक गांव में न तो ताड़ी बिकती है और न ही शराब।

 

सामाजिक सद्भाव भी इस गांव की पहचान है। यहां राजपूत, यादव, रविदास और पासवान समेत विभिन्न जातियों के लोग रहते हैं, लेकिन कभी जातिगत तनाव की स्थिति नहीं बनी। सभी लोग मिल-जुलकर रहते हैं और एक-दूसरे के सुख-दुख में भागीदार बनते हैं। गांव में पर्यावरण संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। कई दुर्लभ फलदार पेड़ लगाए गए हैं, जिनकी देखभाल सामूहिक रूप से की जाती है।

 

चंडी थानाध्यक्ष सुमन कुमार भी इस गांव की व्यवस्था और शांति की सराहना करते हैं। उनके अनुसार, थाना क्षेत्र के अन्य गांवों की तुलना में ढकनिया साफ-सफाई और कम अपराध के मामले में बेहतर स्थिति में है। उनके कार्यकाल में यहां केवल एक मामूली मारपीट का मामला दर्ज हुआ, जिसमें त्वरित कार्रवाई की गई।

 

आज के दौर में जहां छोटी-छोटी बातों पर विवाद और मुकदमे आम हैं, वहीं ढकनिया गांव ने सामाजिक समझदारी और सामूहिक निर्णय की ताकत को साबित किया है। यह गांव दिखाता है कि कानून से पहले समाज का अनुशासन और आपसी सहमति ही स्थायी शांति की नींव होती है। ढकनिया वास्तव में बिहार के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुका है।

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