पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव की ज़िंदगी हमेशा विवादों और संघर्षों से भरी रही है, लेकिन उनकी प्रेम कहानी भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रही। पप्पू यादव ने अपनी आत्मकथा ‘द्रोहकाल का पथिक’ में अपनी प्रेम कहानी का विस्तार से ज़िक्र किया है, जिसकी शुरुआत साल 1991 में हुई थी, जब वे पटना के बांकीपुर जेल में बंद थे।
किताब में पप्पू यादव लिखते हैं कि जेल सुपरिटेंडेंट के आवास से सटे मैदान में खेलते लड़कों को देखना उन्हें अच्छा लगता था। उन्हीं लड़कों में एक था विक्की, जो रंजीत रंजन का भाई था। विक्की से बढ़ती दोस्ती के बीच एक दिन उसने अपनी फैमिली एलबम दिखाई। उसी एलबम में रंजीत रंजन की टेनिस खेलते हुए तस्वीर देखकर पप्पू यादव पहली नज़र में ही उन्हें दिल दे बैठे।
पप्पू यादव बताते हैं कि जेल में उन्हें कुछ खास सुविधाएं मिली हुई थीं। वे आसपास के मैदान में जा सकते थे और जेलर के फोन का इस्तेमाल भी कर पाते थे। रंजीत की तस्वीर देखने के बाद वे अक्सर उनके घर फोन किया करते थे। शुरुआत में सिर्फ आवाज सुनने के लिए कॉल करते थे, फिर बातचीत का सिलसिला भी शुरू हो गया। पप्पू ने रंजीत को पहली बार पटना क्लब में एक स्पोर्ट्स इवेंट के दौरान देखा, जहां वे मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थे। उस वक्त रंजीत सिर्फ 17 साल की थीं और नेशनल–इंटरनेशनल स्तर की टेनिस खिलाड़ी थीं।
हालांकि रंजीत की भावनाएं पप्पू यादव के लिए वैसी नहीं थीं। बार-बार प्रपोजल ठुकराए जाने के बाद पप्पू यादव ने आवेश में नींद की गोलियां खा लीं, जिसके बाद उन्हें पटना मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराना पड़ा। इस घटना के बाद रंजीत का दिल पिघला।
शादी की राह आसान नहीं थी। दोनों का धर्म अलग था और रंजीत के पिता सिख धर्म के बड़े धार्मिक पद पर थे। शर्त रखी गई कि शादी के लिए पप्पू यादव को सिख धर्म अपनाना होगा और रंजीत दिल्ली में रहेंगी। पप्पू यादव ने सभी शर्तें स्वीकार कीं। अंततः राज्यसभा सांसद एस. एस. अहलूवालिया की मध्यस्थता से शादी को मंजूरी मिली।
किताब के अनुसार, शादी के दिन चार्टर्ड प्लेन रास्ता भटक गया, जिससे रंजीत का परिवार देर से पहुंचा। तमाम उतार-चढ़ाव के बाद आखिरकार 6 फरवरी 1994 को पूर्णिया में भव्य समारोह के बीच पप्पू यादव और रंजीत रंजन विवाह बंधन में बंधे। इस शादी में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव भी शामिल हुए।
