भागलपुर में लोक आस्था और सूर्य उपासना से जुड़ा महापर्व ठाड़ी व्रत माघ माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को पूरे श्रद्धा, भक्ति और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। चार दिनों तक चलने वाला यह कठिन व्रत मुख्य रूप से संतान की दीर्घायु, परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली के लिए महिलाओं द्वारा किया जाता है। हालांकि कई स्थानों पर पुरुष व्रती भी इस कठिन साधना में सहभागी बने नजर आए।
मान्यता है कि ठाड़ी व्रत के दिन व्रती निर्जला उपवास रखते हैं और पूरे दिन धरती पर खड़े रहकर पूजा-अर्चना करते हैं। इसी कठोर नियम के कारण इसे “ठाड़ी व्रत” कहा जाता है। अहले सुबह व्रतियों ने स्नान-ध्यान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए और सूर्य देव तथा छठी मैया की विधिवत पूजा की। पूजा के दौरान ठेकुआ, गुड़, फल, चावल, गेहूं और दीप का विशेष महत्व रहा। मंत्रोच्चार और लोकगीतों के बीच वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया।
पीरपैंती प्रखंड के बाबूपुर, बाखरपुर, गोविंदपुर, परशुरामपुर, खवासपुर, एकचारी और रानी दियारा के गंगा घाटों पर हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने पवित्र स्नान किया। इसके बाद गांवों के मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना की गई। शाम के समय व्रतियों ने डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया, जिससे गंगा घाटों पर आस्था का अद्भुत दृश्य देखने को मिला।
इस दौरान एक भावुक कर देने वाली तस्वीर भी सामने आई, जिसमें एक छोटा बच्चा श्रद्धालुओं के साथ पूजा में शामिल नजर आया। यह दृश्य ठाड़ी व्रत से जुड़ी गहरी आस्था, संस्कार और लोक परंपरा को दर्शाता है, जहां आस्था पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती दिखाई देती है।
ठाड़ी व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि नारी शक्ति, संयम, धैर्य और अटूट विश्वास का प्रतीक है। यह पर्व लोक संस्कृति को जीवंत रखने के साथ-साथ परिवार और समाज में एकता व सद्भाव का संदेश भी देता है।
