बेगूसराय सिमरिया धाम में आयोजित राजकीय कल्पवास मेला धार्मिक आस्था के साथ-साथ सांस्कृतिक प्रस्तुतियों को लेकर भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इसी क्रम में कला एवं संस्कृति विभाग, बिहार तथा जिला प्रशासन बेगूसराय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सांस्कृतिक संध्या के आठवें सत्र में भागलपुर के कलाकार निभाष चंद्र मोदी ने अपनी शानदार कथक नृत्य प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी प्रस्तुति के दौरान सांस्कृतिक मंच तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
**कथक की पारंपरिक तालों पर दिखाया हुनर**
एकता कला मंच, भागलपुर की ओर से आयोजित सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की शुरुआत निभाष चंद्र मोदी ने कथक नृत्य के मंगलाचरण से की। इसके बाद उन्होंने एकताल, झपताल और धमार ताल पर आधारित शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुत किया। उनके नृत्य में लय, ताल, भाव और पद संचालन का सुंदर समन्वय देखने को मिला।
प्रस्तुति का सबसे खास आकर्षण तबले और घुंघरू के बीच सवाल-जवाब की अनूठी जुगलबंदी रही। तबले की थाप और घुंघरुओं की झंकार के साथ निभाष चंद्र मोदी की सधी हुई पदचाप ने दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। तालों की जटिलता के बीच उन्होंने जिस सहजता और कुशलता के साथ अपनी कला का प्रदर्शन किया, उसकी दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ सराहना की।
**’उगना’ और ‘सती बिहुला विषहरी’ का हुआ मंचन**
इसी सांस्कृतिक संध्या में कथक के अलावा ‘उगना’ नृत्य नाटिका और अंग प्रदेश की प्रसिद्ध लोकगाथा ‘सती बिहुला विषहरी’ की भी शानदार प्रस्तुति हुई। राजेश कुमार झा के निर्देशन में प्रस्तुत ‘उगना’ के माध्यम से कवि विद्यापति और भगवान शिव की अनूठी भक्ति कथा का भावपूर्ण मंचन किया गया।
इसमें महेश प्रसाद साह ने उगना और राजेश कुमार झा ने कवि विद्यापति की भूमिका निभाई, जबकि डॉ. जयंत जलद ने सहायक की भूमिका अदा की। वहीं, ‘सती बिहुला विषहरी’ की प्रस्तुति के माध्यम से अंग प्रदेश की समृद्ध लोकसंस्कृति और पारंपरिक लोकगाथा को मंच पर जीवंत किया गया।
**कलाकारों को अंगवस्त्र देकर किया सम्मानित**
कार्यक्रम का संचालन रामसुंदर गांधी ने किया। मंच व्यवस्था में मनीष कौशिक एवं सहयोगियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कार्यक्रम के समापन पर जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी श्याम कुमार सहनी ने कलाकारों को अंगवस्त्र एवं स्मृति चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया।
सिमरिया धाम की इस सांस्कृतिक संध्या में निभाष चंद्र मोदी की कथक प्रस्तुति विशेष आकर्षण का केंद्र बनी रही। शास्त्रीय नृत्य की पारंपरिक तालों और तबले-घुंघरू की शानदार जुगलबंदी के जरिए उन्होंने भागलपुर की सांस्कृतिक और शास्त्रीय कला परंपरा को एक बार फिर मंच पर प्रस्तुत किया।





