पटना: बिहार में बदलती जीवनशैली युवाओं की सेहत पर असर डाल रही है। अनियमित खान-पान, मोटापा, मानसिक तनाव और नींद की कमी के कारण 18 से 40 साल की उम्र के युवाओं में खर्राटे लेने की समस्या बढ़ रही है। चिकित्सकों के मुताबिक, लगातार तेज खर्राटे लेना कई बार ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एपनिया यानी ओएसए का संकेत हो सकता है। इस बीमारी में सोते समय बार-बार सांस रुकने या सांस का प्रवाह कम होने की समस्या होती है।
शोध में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य
आईएमए और आईजीआईएमएस के चिकित्सकों के शोध का हवाला देते हुए बताया गया है कि कम उम्र के युवाओं में भी खर्राटों की शिकायत सामने आ रही है। चेस्ट और रेस्पिरेटरी ओपीडी में आने वाले मरीजों में खर्राटों की समस्या आम होती जा रही है। हालांकि, 40 फीसदी युवाओं और 12.45 लाख लोगों पर किए गए अध्ययन से जुड़े इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
मोटापा और तनाव बड़ी वजह
आईजीआईएमएस के श्वसन रोग विशेषज्ञ डॉ. सत्यदेव चौबे के अनुसार, अधिक वजन वाले युवाओं में खर्राटों की समस्या ज्यादा देखी जा रही है। मोटापे और मेटाबॉलिक सिंड्रोम के कारण यह परेशानी बढ़ सकती है। नींद के दौरान सांस लेने में रुकावट से नींद पूरी नहीं होती, जिसका असर ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर पर भी पड़ सकता है। गंभीर मामलों में हृदय रोग का खतरा भी बढ़ सकता है।
वहीं, डॉ. मनीष शंकर के मुताबिक, मोटापे के कारण खर्राटों की समस्या बढ़ रही है। इसके चलते दिन में नींद, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता में कमी जैसी परेशानियां हो सकती हैं। ऐसे में वाहन चलाते समय नींद आने की समस्या को गंभीरता से लेना चाहिए।
बचाव के लिए क्या करें?
डॉक्टरों ने युवाओं को नियमित व्यायाम करने, वजन नियंत्रित रखने, संतुलित खान-पान अपनाने और पर्याप्त नींद लेने की सलाह दी है। सोने-जागने का समय निश्चित रखना भी जरूरी है। यदि खर्राटों के साथ सांस रुकती है, हांफकर नींद खुलती है या दिनभर अत्यधिक नींद आती है, तो डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। जरूरत पड़ने पर स्लीप स्टडी कराई जा सकती है।
कुल मिलाकर, खर्राटों को सामान्य समझकर नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। समय पर जांच और उचित इलाज से गंभीर समस्याओं से बचाव किया जा सकता है।








