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“मैं दिग्घी तालाब हूं… कभी गया की शान था, आज बदहाली और नशेड़ियों का अड्डा बन गया”

गयाजी का ऐतिहासिक दिग्घी तालाब आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। कभी शहर का ‘हृदय स्थल’ कहलाने वाला यह तालाब अब गंदगी, बदबू और प्रशासनिक उपेक्षा का प्रतीक बन चुका है। अंग्रेजों के दौर में बनाए गए इस तालाब का उद्देश्य गया शहर के भूजल स्तर को संतुलित रखना था। उस समय इसका पानी चांदी की तरह चमकता था और यहां नौका विहार लोगों का प्रमुख आकर्षण हुआ करता था।

लेकिन समय के साथ विकास के नाम पर तालाब का अस्तित्व सिकुड़ता गया। इसके एक हिस्से पर आयुक्त कार्यालय, डीएम कार्यालय और अन्य सरकारी भवन खड़े कर दिए गए। फिर 1993-95 के दौरान तालाब के चारों ओर मीट-मछली की दुकानें खुल गईं। दुकानों का कचरा और शहर के गंदे नालों का पानी सीधे तालाब में गिरने लगा, जिससे इसका पानी जहरीला और बदबूदार हो गया।

1987 से 1990 तक यहां शाम के समय लोगों की भीड़ लगती थी। पर्यटक नौका विहार का आनंद लेते थे, लेकिन अब यहां नशेड़ियों और असामाजिक तत्वों का कब्जा है। लोग शराब पीकर बोतलें तालाब में फेंक देते हैं। सुरक्षा के लिए लगाए गए शीशे भी तोड़ दिए गए हैं।

स्थानीय निवासी शंभू दास बताते हैं कि शाम होते ही यहां शराब और गांजा पीने वालों की महफिल सजती है। वहीं आचार्य रामाकांत शास्त्री का कहना है कि यह जगह कभी लोगों को सुकून देती थी, लेकिन अब इसकी हालत चिंताजनक हो चुकी है। इतिहास विशेषज्ञ विजय कुमार मिठ्ठू ने आरोप लगाया कि वर्ष 2018 में 2 करोड़ 54 लाख रुपए से सौंदर्यीकरण के नाम पर सिर्फ कागजी खानापूर्ति हुई।

सबसे हैरानी की बात यह है कि तालाब के आसपास कलेक्ट्रेट, एसपी कार्यालय और सिविल कोर्ट जैसे बड़े सरकारी संस्थान मौजूद हैं, फिर भी प्रशासन मौन है। दिग्घी तालाब अब अपने अस्तित्व और पुनर्जीवन की गुहार लगा रहा है।

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