नई दिल्ली से बड़ी खबर सामने आई है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख नेता लालू प्रसाद यादव को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने “जमीन के बदले नौकरी” मामले में सीबीआई की प्राथमिकी (FIR) को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया है।
यह मामला जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच के सामने आया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस चरण पर हस्तक्षेप करने से अपनी अनिच्छा जताई, लेकिन साथ ही यादव को ट्रायल के दौरान कानूनी मुद्दे उठाने की अनुमति दे दी।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत रूप से पेश होने से छूट दी जाती है और वे ट्रायल के दौरान सभी कानूनी तर्क रख सकते हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि लंबित कानूनी सवालों के कारण ट्रायल की प्रक्रिया नहीं रुकेगी।
लालू प्रसाद यादव की ओर से वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि बिना पूर्व मंजूरी के जांच शुरू करना ही गलत है। उन्होंने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A का हवाला देते हुए कहा कि रेल मंत्री के तौर पर लिए गए फैसलों की जांच से पहले मंजूरी जरूरी थी।
वहीं, केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने इस दलील का विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह याचिका देर से दायर की गई है और अब जब जांच पूरी हो चुकी है तथा कोर्ट संज्ञान ले चुका है, तो इसे इस स्तर पर रद्द नहीं किया जा सकता।
इससे पहले भी यादव की याचिका खारिज कर चुका है। हाई कोर्ट ने कहा था कि धारा 17A वर्ष 2018 में लागू हुई थी, इसलिए इसे 2004 से 2009 के बीच हुए कथित मामलों पर लागू नहीं किया जा सकता।
यह मामला उस समय का है जब लालू यादव रेल मंत्री थे। आरोप है कि रेलवे में ग्रुप-डी की नौकरियों के बदले उनके परिवार या करीबियों को जमीन ट्रांसफर की गई थी। इस मामले में ने 2022 में केस दर्ज किया था।
अब इस फैसले के बाद साफ है कि मामले की सुनवाई जारी रहेगी और असली कानूनी लड़ाई ट्रायल कोर्ट में होगी।
