गया जिले के भलुआ पंचायत के 15 गांव आज भी एक अदद सड़क के लिए तरस रहे हैं। आज़ादी के 78 साल बाद भी यहां 15 किलोमीटर लंबी सड़क इस हालत में है कि एंबुलेंस तो दूर, बाइक तक निकालना मुश्किल है। नतीजा—गर्भवती महिलाओं को अस्पताल ले जाने के लिए ट्रैक्टर या खटोले का सहारा लेना पड़ता है, और समय पर इलाज न मिलने से हर साल 10–15 जच्चा-बच्चा की मौत हो जाती है।

### **ट्रैक्टर पर डिलीवरी, बच्चा नहीं बचा**

हरनाही गांव के मोनू भोक्ता पिता बनने की तैयारी में थे। आठ दिन पहले उनकी गर्भवती पत्नी सोनी देवी की तबीयत अचानक बिगड़ गई। गांव में एंबुलेंस नहीं आती, इसलिए ट्रैक्टर का सहारा लिया गया। रास्ता इतना उबड़-खाबड़ था कि सफर के बीच ही डिलीवरी हो गई। सोनी देवी की जान तो बच गई, लेकिन बच्चा नहीं बच सका। मोनू की आंखों में आंसू हैं—”भगवान को कुछ और ही मंजूर था। सड़क अगर अच्छी होती, तो शायद मेरा बच्चा जिंदा होता।”

### **बरसात में और बढ़ जाती आफत**

पिपराही गांव की मुनिया देवी बताती हैं कि बरसात में हालात और बिगड़ जाते हैं। सड़क कीचड़ और गड्ढों में बदल जाती है, ट्रैक्टर भी फंस जाते हैं। ऐसे में मरीज को अस्पताल ले जाने में घंटों लग जाते हैं। कई बार रास्ते में ही जच्चा या बच्चा की मौत हो जाती है, और कभी-कभी दोनों की।

“हमारे यहां डिलीवरी के लिए महिलाएं 25 किलोमीटर दूर बाराचट्टी अस्पताल या 30 किलोमीटर दूर चौपारण अस्पताल ले जाई जाती हैं। ट्रैक्टर ही एकमात्र साधन है। कई दशकों से यही सिलसिला चल रहा है।” — मुनिया देवी, पिपराही

### **71 माइल से सिसियातरी तक—15 गांव का दर्द**

भलुआ पंचायत में 71 माइल जीटी रोड से सिसियातरी गांव तक की 15 किलोमीटर सड़क 15 गांवों की जीवनरेखा है—फुनगुनिया, दोआठ, बड़की चापी, छोटकी चापी, सिसियातरी, पिपराही, हरनाही, गुलरिया टांड़, डांग, शंखवा समेत अन्य। यहां कुल आबादी 8,000 से अधिक है, 1,000 से ज्यादा घर और 3,600 से ज्यादा वोटर हैं। लेकिन सड़क इतनी खराब है कि पैदल चलना भी मुश्किल है।

ग्रामीण धनु यादव कहते हैं—”गर्भवती महिला को ट्रैक्टर पर खटिया बिछाकर ले जाना पड़ता है। सफर भगवान भरोसे होता है। कभी बच्चा तो कभी जच्चा की मौत हो जाती है। यह दशकों से जारी है।”

### **वन विभाग की फाइलों में अटका निर्माण**

भलुआ पंचायत के उपमुखिया सुरेंद्र कुमार यादव बताते हैं—”बरसात के चार महीने तो हालात और खराब हो जाते हैं। ट्रैक्टर भी कीचड़ में धंस जाते हैं। वन विभाग से एनओसी नहीं मिलने के कारण सड़क का निर्माण लटका है, जबकि 85 एकड़ जमीन वन विभाग को दी जा चुकी है।”

प्रखंड प्रमुख प्रतिनिधि जगदीश यादव भी यही बात दोहराते हैं—”वन विभाग ने जमीन के बदले सड़क बनाने की बात कही थी। जमीन दे दी गई, लेकिन प्रक्रिया अधर में है।”

### **स्कूल और रोज़गार पर असर**

सड़क की बदहाली ने न सिर्फ इलाज बल्कि शिक्षा और रोज़गार पर भी असर डाला है। प्राथमिक विद्यालय, मध्य विद्यालय और प्लस टू विद्यालय पिपराही में हैं, लेकिन वहां पहुंचना बच्चों के लिए रोज़ की जंग है। बरसात में बच्चे नदी पार कर जाते हैं, जिससे डूबने का खतरा रहता है। कई बार हादसे हो चुके हैं।

ग्रामीण धनेश्वर भोक्ता कहते हैं—”हमारे यहां शादी करने भी लोग नहीं आते। रास्ता देखकर बारात लौट जाती है। रोजगार के लिए भी लोग बाहर जाने को मजबूर हैं।”

### **शिक्षक भी परेशान**

मध्य विद्यालय पिपराही के प्रभारी प्रधानाध्यापक देवानंद कुमार सिंह बताते हैं—”हम शिक्षकों को रोज़ाना इस रास्ते से गुजरना पड़ता है। बाइक बीच में फंस जाए तो पहले सड़क समतल करनी पड़ती है। यह दुर्भाग्य है कि गर्भवती महिलाओं को भी ट्रैक्टर से ले जाना पड़ता है।”

### **सरकारी दावे और जमीनी हकीकत**

बिहार सरकार का दावा है कि राज्य के सभी गांव सड़क से जुड़े हैं, लेकिन गया जिले का यह इलाका उस दावे की पोल खोलता है। आज़ादी के बाद से अब तक यहां कभी सड़क बनी ही नहीं। हजारों की आबादी अब भी पैदल, खटोले या ट्रैक्टर के भरोसे है।

### **हर साल मौतों का सिलसिला**

ग्रामीणों के मुताबिक, हर साल औसतन 10–15 मौतें सिर्फ इसलिए हो जाती हैं क्योंकि मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाते। सड़क पर गड्ढे इतने बड़े हैं कि यह पहचानना मुश्किल है कि यह सड़क है या खेत का हिस्सा। बरसात में कीचड़ का दलदल बन जाता है।

### **लोगों की मांग**

ग्रामीण, पंचायत प्रतिनिधि और शिक्षक सभी की एक ही मांग है—71 माइल जीटी रोड से सिसियातरी तक सड़क का शीघ्र निर्माण हो। इससे न सिर्फ जानलेवा घटनाएं रुकेंगी, बल्कि इलाके में शिक्षा, रोज़गार और विकास के रास्ते खुलेंगे।

### **समापन—78 साल बाद भी इंतज़ार**

भलुआ पंचायत के ये 15 गांव आज भी बुनियादी सुविधा से वंचित हैं। हरनाही के मोनू भोक्ता जैसे कई पिता और मुनिया देवी जैसी मांओं का दर्द सरकारी फाइलों में दबा हुआ है। सड़क अगर बन जाए, तो इन गांवों में विकास की तस्वीर बदल सकती है। फिलहाल, यहां की आबादी बस यही दुआ करती है कि कोई बीमार न पड़े—क्योंकि अस्पताल तक का सफर आज भी मौत के मुंह में ले जा सकता है।

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