मोतिहारी में स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (आरएयू) ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए पहली बार IVF तकनीक से साहीवाल नस्ल की बछिया पैदा की है। यह सफलता न सिर्फ वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि भारत की दुग्ध उत्पादन रणनीति के लिए भी मील का पत्थर मानी जा रही है।

विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने ओवम पिक-अप (OPU-IVF) तकनीक का उपयोग कर कुल चार स्वस्थ साहीवाल बछड़ों का जन्म कराया। इनमें तीन बछड़ों का जन्म पिपराकोठी स्थित देसी नस्ल संवर्धन केंद्र में हुआ, जबकि एक बछड़ा चकिया गौशाला में पैदा हुआ। कुलपति डॉ. पी.एस. पांडेय के अनुसार, यह तकनीक देसी नस्लों के तेज़ी से आनुवंशिक सुधार में मदद करेगी।

साहीवाल नस्ल, जो पंजाब और हरियाणा की प्रमुख देसी नस्ल है, अपनी अधिक दूध उत्पादन क्षमता और गर्मी सहन करने की ताकत के लिए जानी जाती है। खास बात यह है कि IVF तकनीक से अब ऐसी बछिया तैयार की जा सकती है, जिसमें शुद्ध साहीवाल के गुण होंगे, भले ही उसकी मां विदेशी नस्ल की हो।

विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में विदेशी नस्लें जैसे होलस्टीन फ्रिसियन और जर्सी भारत के लिए कम उपयुक्त साबित हो रही हैं। ये नस्लें अधिक बीमार पड़ती हैं और स्थानीय परिस्थितियों में टिक नहीं पातीं। इसके विपरीत, साहीवाल जैसी देसी नस्लें कम रखरखाव में बेहतर प्रदर्शन करती हैं।

डेयरी वैज्ञानिकों के अनुसार, साहीवाल गाय A2 प्रकार का दूध देती है, जो पाचन के लिए बेहतर और पोषण से भरपूर होता है। बाजार में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है, जिससे किसानों की आय में इजाफा होगा।

IVF तकनीक से नस्ल सुधार की प्रक्रिया तेज होगी और कम समय में बेहतर गुणवत्ता वाले पशु तैयार किए जा सकेंगे। इससे किसानों की लागत घटेगी और उत्पादन बढ़ेगा।

विश्वविद्यालय अब इस तकनीक को गांव-गांव तक पहुंचाने की योजना बना रहा है। प्रशिक्षण और कम लागत वाली सेवाओं के जरिए किसानों को इससे जोड़ा जाएगा।

यह पहल बिहार के दुग्ध उद्योग के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती है और देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।

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