बिहार के भेटौरा पंचायत में आज स्वास्थ्य सुधार का एक सफल मॉडल उभर कर सामने आया है। यहां के मुखिया दिलीप यादव और पूर्व मुखिया अनिल देवी की पहली ने पूरे सिस्टम को बदल दिया है। कभी-कभी जच्चा-बच्चा की मृत्यु हो जाती थी, आज यह पंचायत ‘होम फूड फ्री’ बन गई है और इसकी चर्चा अमेरिका तक हो रही है।

करीब 22 हजार की आबादी वाले इस पंचायत में सबसे बड़ी समस्या थी अस्पताल की दूरी। टनकुप्पा क्लिनिकल हेल्थ सेंटर यहां से 30 किमी दूर है और समय पर मेयर नहीं मिल पाने से कई महिलाओं की जान छीन ली गई थी। इस स्थिति को देखते हुए 2021-22 में ऐनटिन देवी ने अपनी निजी ऑटोमोबाइल्स को बिल्डर में बदल दिया। इसमें ऑक्सीजन और जरूरी दस्तावेज 24×7 सेवा शुरू की गई।

इस पहले से बड़ा बदलाव आया। अब गर्भवती महिलाओं को तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया। पिछले करीब 5 वर्षों में 1000 से अधिक सुरक्षित लैबोरेटरी में तकनीशियन दिए गए हैं। पहले जहां ज्यादातर पिज्जा घरों में होते थे, अब 95 फीसदी से ज्यादा पिज्जा अस्पतालों में हो रही है। सबसे अहम बात यह है कि हाल के वर्षों में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर लगभग शून्य हो गई है।

2025 में मुखिया बने दिलीप यादव ने इस अभियान को और मजबूत किया। आशा, प्रशिक्षण एवं स्वास्थ्य विभाग के सहयोग से जागरूकता अभियान चलाया गया। गर्भवती महिलाओं को पासपोर्ट पासपोर्ट सुरक्षित डॉक्टर और सरकारी मंजूरी की जानकारी दी जाती है, जिससे लोगों का आत्मविश्वास मजबूत होता है।

भेटौरा मॉडल को अंतर्राष्ट्रीय डॉक्टर भी मिला है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति के सलाहकार रॉबर्ट रोजन ने पहली बार पंचायत का दौरा किया था। वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी ‘होम फ़्रॉम मुक्त पंचायत’ के प्रभारी की भूमिका निभाई।

भेटौरा पंचायत की यह कहानी बताती है कि मजबूत इरादे और सही नेतृत्व से सीमित ढांचे में भी बड़ा बदलाव संभव है।

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