पटना: बिहार में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही शिक्षा विभाग ने स्कूलों में शत-प्रतिशत नामांकन, ड्रॉपआउट रोकने और पढ़ाई की गुणवत्ता सुधारने पर अपना फोकस तेज कर दिया है। सरकारी स्कूलों में एक बार फिर बच्चों की रौनक लौट आई है, लेकिन विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि 5 साल से अधिक उम्र का कोई भी बच्चा स्कूल से बाहर न रहे।
शिक्षा मंत्री ने बताया कि के नेतृत्व में राज्य में शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक सुधार हुए हैं। सरकार ने बजट बढ़ाने के साथ-साथ स्कूलों की संख्या, शिक्षकों की उपलब्धता और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार पर लगातार काम किया है। अब गांवों तक यह संदेश पहुंच चुका है कि शिक्षा ही सामाजिक और आर्थिक बदलाव का सबसे बड़ा माध्यम है।
विभाग टोला सेवक, तालीमी मरकज और अन्य माध्यमों से गांव-गांव जागरूकता अभियान चला रहा है, ताकि कोई भी बच्चा नामांकन से वंचित न रह जाए। मिड डे मील, यूनिफॉर्म, बेंच-डेस्क, शुद्ध पेयजल और शौचालय जैसी सुविधाओं से सरकारी स्कूलों के प्रति लोगों का भरोसा बढ़ा है।
हालांकि, मंत्री ने स्वीकार किया कि कई जगहों पर अभी भी सुधार की जरूरत है। खासकर माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर चिंता का विषय है। आठवीं के बाद लगभग 20 प्रतिशत बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं। इस समस्या से निपटने के लिए हर पंचायत में प्लस-टू स्कूल की व्यवस्था की गई है, जिससे छात्रों को दूर नहीं जाना पड़े।
ड्रॉपआउट कम करने के लिए साइकिल योजना, पोशाक योजना और समय पर किताबों की उपलब्धता को मजबूत किया गया है। साथ ही, बड़ी संख्या में नए शिक्षकों की नियुक्ति भी की गई है।
सरकार अब कंप्यूटर शिक्षा और अंग्रेजी पर भी विशेष ध्यान दे रही है। हर ब्लॉक में मॉडल और पीएम श्री स्कूल विकसित किए जा रहे हैं। हालांकि, 76 हजार स्कूलों में एक साथ डिजिटल सुविधा देना चुनौतीपूर्ण है, लेकिन इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है।
मंत्री ने भरोसा जताया कि आने वाले वर्षों में बिहार में डिजिटल शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।
