मुजफ्फरपुर से एक बड़ा और चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां बिहार के विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्तियों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। समेत राज्य के कई विश्वविद्यालयों में फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र, गलत दिव्यांगता प्रमाण पत्र और संदिग्ध रिसर्च पब्लिकेशन के आधार पर नियुक्तियां किए जाने के आरोप लगे हैं।
बताया जा रहा है कि के माध्यम से वर्ष 2020 से 2025 के बीच हुई बहाली में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुई हैं। आरोप है कि कई अभ्यर्थियों ने फर्जी दस्तावेजों के जरिए न सिर्फ चयन प्रक्रिया को प्रभावित किया, बल्कि दिव्यांगता कोटे का भी गलत लाभ उठाया। इसके अलावा, उनके द्वारा प्रस्तुत रिसर्च पब्लिकेशन की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए निगरानी विभाग ने जांच तेज कर दी है। विशेष कार्य पदाधिकारी डेजी ईरानी ने शिकायतकर्ता से एक महीने के भीतर ठोस साक्ष्य और शपथ पत्र मांगा है। साथ ही यह भी पूछा गया है कि क्या वे आगे की जांच में सहयोग करने को तैयार हैं। विभाग ने नियुक्ति के समय जमा किए गए दस्तावेजों और हस्ताक्षरों के सत्यापन के निर्देश भी दिए हैं।
अब तक 50 से अधिक असिस्टेंट प्रोफेसरों के नाम इस घोटाले में सामने आ चुके हैं, जबकि 130 से अधिक अभ्यर्थियों की याचिका पर उच्च न्यायालय में सुनवाई जारी है। यह मामला अब राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री कार्यालय और राजभवन तक पहुंच चुका है।
जांच में कुछ बेहद चौंकाने वाले तथ्य भी सामने आए हैं। एक संबद्ध कॉलेज ने बिना मान्यता वाले सत्रों के लिए अनुभव प्रमाण पत्र जारी किए, जबकि एक अन्य कॉलेज ने मात्र दो दिनों में नियुक्ति और सेवा पुष्टि दिखाकर अनुभव पत्र थमा दिए। इतना ही नहीं, एक क्लर्क को शिक्षक का अनुभव प्रमाण पत्र दे दिया गया।
सबसे हैरान करने वाली बात तब सामने आई जब मूक-बधिर कोटे से नियुक्त एक शिक्षक का कक्षा में बोलकर पढ़ाने का वीडियो वायरल हुआ।
कुलपति प्रो. दिनेश चंद्र राय ने कहा है कि जांच रिपोर्ट आयोग को भेज दी गई है और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित शिक्षकों की नियुक्ति रद्द कर दी जाएगी।
