पटना: भारतीय इतिहास और साहित्य की गूंज अब देश की सीमाओं से दुनिया तक पहुंच रही है। इस दिशा में एक अहम काम कर रहे हैं अमेरिकी इतिहासकार और विद्वान विलियम पिंच। वे इन दिनों बिहार और उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों का दौरा कर साइंटिस्टों और किसान आंदोलन से जुड़े इतिहास की खोज कर रहे हैं।
विलियम पिंच अमेरिका के वेस्लेयन विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर हैं। ईटीवी भारत से बातचीत में उन्होंने बताया कि बिहार की मिट्टी से उनके क्या खास फायदे हैं. वे प्रसिद्ध साकेतियों पर ही नहीं बल्कि उन गुमनाम रचनाकारों पर भी शोध कर रहे हैं, जो कि अलग-अलग योगदान इतिहास में कहीं और प्रचलित हैं।
इससे पहले भी बिहार के किसान आंदोलन पर शोध कर चुके हैं। उनका यह शोध इतना महत्वपूर्ण माना गया कि अमेरिका के विश्वविद्यालय में किसान आंदोलन के पाठ्यक्रम को शामिल किया गया।
इन दिनों पश्चिमी हिमाचल प्रदेश, पूर्वी हिमाचल प्रदेश, मोतिहारी, सिट्टा, लौरिया और केसरिया जैसे क्षेत्र का दौरा किया जा रहा है। यहां वे स्थानीय वैज्ञानिकों, किसान नेताओं और इतिहास से जुड़े लोगों से बातचीत कर रहे हैं। उनका कहना है कि ये लोग सिर्फ लेखक नहीं बल्कि समाज और इतिहास को दिशा देने वाले महत्वपूर्ण पात्र हैं।
विलियम पिंच का बचपन भी भारत और पाकिस्तान में बीता है। उनके पिता अमेरिकी एम्बेसी में राजनयिक थे, जिसके कारण वे दिल्ली, लखनऊ और कराची जैसे शहरों में रहे। यही कारण है कि भारतीय समाज, संस्कृति और इतिहास को समझने में उनकी विशेष रुचि है।
पिंच अब तक तीन महत्वपूर्ण उद्धरण लेख लिखे गए हैं। उनकी पहली पुस्तक योद्धा तपस्वियों और भारतीय साम्राज्यों में 16वीं से 19वीं सदी के साधु-संतों और सैन्य शक्ति का ज़िक्र है। दूसरी पुस्तक पीजेंट्स एंड मॉन्क्स इन ब्रिटिश इंडिया में औपनिवेशिक भारत के किसान और धार्मिक समुदाय के अधिकार की बात कही गई है। तीसरी पुस्तक राष्ट्र में जाति, धर्म और राष्ट्रवाद के सिद्धांतों का विरोध करते हुए केंद्र में रखी गई है।
अपने वर्तमान शोध में पिंच माइक्रो क्रॉनिकल्स पर काम कर रहे हैं। वे इतिहास के छोटे-छोटे मासूमों को सामने लाते हैं और बुद्धिजीवियों को पहचानने की कोशिश कर रहे हैं। इसी कड़ी में वे महंत धनराज पुरी पर भी शोध कर रहे हैं, जिनमें सहजानंद सरस्वती ने ‘काव्य संगीत’ और ‘साहित्याचार्य’ की डिग्री दी थी, लेकिन आज उनके नाम इतिहास में लगभग गम हो गया है।
पिंच की आने वाली किताब में बिहार और उत्तर भारत के किसान आंदोलन और उससे जुड़े साथियों के अनछुए सिद्धांतों को सामने लाने की कोशिश की जा रही है।
