मुजफ्फरपुर के सकरा की रहने वाली विभा देवी कहती हैं, “पहले पति की मजदूरी से घर चलाना मुश्किल था, लेकिन अब मैं भी कमाई कर रही हूं और बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रही हूं।” यह बदलाव संभव हुआ है बबीता गुप्ता की पहल से, जिन्होंने सैकड़ों महिलाओं की जिंदगी बदल दी।
विभा देवी ही नहीं, सुमन देवी जैसी कई महिलाएं अब घर बैठे प्लास्टिक कचरे से सजावटी सामान बनाकर हर महीने 5 से 6 हजार रुपये तक कमा रही हैं। कभी घर तक सीमित रहने वाली ये महिलाएं आज आत्मनिर्भर बन चुकी हैं।
दरअसल, बबीता गुप्ता ने गांव और शहर में फैले प्लास्टिक कचरे को समस्या नहीं, अवसर के रूप में देखा। उन्होंने बेकार प्लास्टिक से गुलदस्ते, कृत्रिम फूल, टोकरी, बैग और डोरमैट जैसे उत्पाद बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे उनके उत्पादों की मांग बढ़ी और यह एक रोजगार का माध्यम बन गया।
बबीता की जिंदगी भी संघर्षों से भरी रही है। वर्ष 2010 में उनके पति के दुर्घटना में दिव्यांग हो जाने के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। आर्थिक तंगी के बीच उन्होंने हार नहीं मानी और गांव-गांव जाकर चूड़ी बेची। बाद में स्वयं सहायता समूह ‘जीविका’ से जुड़कर छोटे ऋण की मदद से राशन की दुकान शुरू की।
साल 2020 में ‘वर्ल्ड विजन’ संस्था से जुड़ने के बाद उन्हें तकनीकी प्रशिक्षण मिला। इसके बाद उन्होंने प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट से जुड़कर काम को विस्तार दिया और अन्य महिलाओं को भी प्रशिक्षण देना शुरू किया। अब तक वह 200 से अधिक महिलाओं को प्रशिक्षित कर चुकी हैं और लगभग 1000 महिलाएं इस पहल से जुड़ी हैं।
बबीता के उत्पादों को कई प्रदर्शनी और महोत्सवों में सराहना मिली है। उनके इसी प्रयास के लिए उन्हें ‘स्वच्छ सुजल शक्ति सम्मान 2023’ से भी सम्मानित किया गया।
आज बबीता गुप्ता न सिर्फ एक सफल उद्यमी हैं, बल्कि महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं।
