नई दिल्ली से एक बड़ी और प्रेरणादायक खबर सामने आई है, जहां भारत ने सड़क निर्माण और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम उठाया है। यानी CSIR के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी स्वदेशी तकनीक विकसित की है, जो खेती के कचरे—खासतौर पर धान की पराली—को ‘बायो-बिटुमेन’ में बदल देती है। यह नवाचार न सिर्फ सड़कों को मजबूत बनाएगा, बल्कि हर साल उत्तर भारत को जकड़ने वाले प्रदूषण की समस्या का भी स्थायी समाधान दे सकता है।

अब समझते हैं कि यह ‘वेस्ट टू वेल्थ’ तकनीक क्या है। आमतौर पर सड़कों के निर्माण में पेट्रोलियम से बनने वाले डामर यानी बिटुमेन का इस्तेमाल होता है, जिसे भारत बड़ी मात्रा में आयात करता है। लेकिन इस नई तकनीक में पराली और अन्य कृषि अवशेषों को ‘पायरोलिसिस’ प्रक्रिया के तहत बिना ऑक्सीजन के उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है। इससे एक चिपचिपा, मजबूत और टिकाऊ बाइंडिंग मटेरियल तैयार होता है, जिसे ‘बायो-बिटुमेन’ कहा जाता है। यह पारंपरिक डामर का सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प है।

इस तकनीक से देश को तीन बड़े फायदे मिलेंगे। पहला, प्रदूषण पर सीधा प्रहार। और में पराली जलाना हर साल में खतरनाक स्मॉग का कारण बनता है। अब किसान इस कचरे को जलाने के बजाय बेचकर अतिरिक्त आय कमा सकेंगे।

दूसरा, आर्थिक बचत। भारत अपनी बिटुमेन जरूरत का लगभग 50 प्रतिशत आयात करता है, जिस पर हर साल करीब 30 हजार करोड़ रुपये खर्च होते हैं। बायो-बिटुमेन के इस्तेमाल से इस खर्च में भारी कमी आएगी और देश आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेगा।

तीसरा, सड़कों की मजबूती। शुरुआती परीक्षण, जैसे -मनसर हाईवे पर, यह साबित हुआ है कि बायो-बिटुमेन से बनी सड़कें ज्यादा टिकाऊ होती हैं और मौसम की मार को बेहतर तरीके से झेलती हैं।

CSIR की महानिदेशक के अनुसार, अब इस तकनीक को बड़े स्तर पर लागू करने की तैयारी है। सरकार का लक्ष्य है कि आने वाले समय में राष्ट्रीय राजमार्गों में 15 से 30 प्रतिशत तक बायो-बिटुमेन का इस्तेमाल अनिवार्य किया जाए। यह पहल भारत में हरित इंफ्रास्ट्रक्चर की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है।

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