पटना/शिवहर: पश्चिम एशिया में जारी प्लास्टिक और प्लांट सप्लाई में कमी का असर अब बिहार की रसोई तक पहुंच गया है. राजधानी पटना से लेकर शिवहर के क्षेत्र तक के विशाल पर्वतों का अवलोकन जारी है। हालात ऐसे हैं कि गैस के चूल्हे ठंडे पड़ गए हैं और लोगों को मजबूरन फिर से मिट्टी के चूल्हे और गोइठा (उपले) का सहारा लेना पड़ता है।
इस संकट ने एक नई ‘गोइथा इकोनोमी’ को जन्म दिया है। जो गोइठा पहले ₹1 में था, वह अब ₹2 प्रति पीस बिक रहा है। मांग इतनी बढ़ गई है कि गोबर भी अब ‘हॉट कमोडिटी’ बन गया है। पटना के विक्रेता राम लखन कर्मचारी पहले अपने खटाल से काम चलाते थे, लेकिन अब बाहर से गोबर खरीदी बिक्री जारी है।
गोइठा बनाने वाली रामुना देवी का कहना है कि आमतौर पर समुद्र में बिक्री कम हो जाती थी, लेकिन इस बार ठंड से भी ज्यादा बिक्री हो रही है। पिछले 10-15 दिनों में बाजार का रुख पूरी तरह से बदल गया है।
शिवहर में स्थिति और गंभीर है। धर्मपुर वार्ड-12 की मीरा देवी का वर्णन है कि गैस गोदाम ₹2000-₹2500 तक पहुंच गया है और मस्जिद पर भी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में महिलाएं रोज सुबह गोइठा खाना सुखाती रहती हैं ताकि घर का खाना बन सके।
पटना के किदवईपुरी और राजीव नगर जैसे महासागर में भी यही हाल है। जादूगर देवी का कहना है कि गैस खत्म होने के बाद ब्लैक मार्केट में महंगाई दम टूट गया और उन्होंने ₹500 का गोइठा खरीदकर चूल्हा जलाना शुरू कर दिया। अब लोग दिन में सिर्फ एक-दो बार ही खाना बना पा रहे हैं।
हालाँकि, गोइठा पर खाना पकाना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। इससे रिलेटेड लाइट लाइट की बीमारी, अस्थमा और आंखों में जलन पैदा हो सकती है।
यह स्थिति केवल स्थानीय समस्या नहीं है, बल्कि व्यापक ऊर्जा संकट का संकेत है। अगर जल्द ही गैस सप्लाई प्लांट नहीं बने और ब्लैक मार्केटिंग पर रोक नहीं लगी तो यह ‘गोइठा रिटर्न’ लंबे समय तक बना रह सकता है।
