लोक आस्था का महापर्व चैती छठ 2026 का दूसरा दिन अर्थात खरना पूजा के साथ पूरी श्रद्धा और उत्साह के बीच मनाया जा रहा है। रविवार को नहाय-खाय के साथ शुरू हुई इस चार दिव्य तीर्थयात्रा में आज व्रती उपवास व्रत के दिन शाम को खरना का प्रसाद ग्रहण करेंगे। सुबह से ही व्रती स्नान-ध्यान कर महाप्रसाद की तैयारी में जुट जाते हैं।
छठ पूजा प्रकृति और सूर्य पूजा का प्रतीक है, जिसमें व्रती भगवान सूर्य और छठी मइया की आराधना की जाती है। इस पर्व की खास बात यह है कि इसमें उपयोग होने वाली हर सामग्री प्रकृति से जुड़ी हुई है, ताकि स्वर्ग और पवित्रता बनी रहे।
इस बीच छठ पूजा में बांस से बने सूप, दौरा और खिलौने का विशेष महत्व देखने को मिल रहा है। मसौढ़ी बाजार में यूक्रेनी दुकान के लिए सुबह से ही भीड़ लगाई जाती है। बांस को हिंदू धर्म में शुद्ध और पवित्र माना जाता है, इसलिए इसका उपयोग छठ पूजा में अनिवार्य रूप से किया जाता है।
मसौढ़ी के श्रीराम जानकी ठाकुरवाड़ी मंदिर के मुख्य पुजारी गोपाल पेंडेंट को बांस की वंश वृद्धि का प्रतीक माना जाता है। जिस प्रकार बांस तेजी से बढ़ता है, उसी प्रकार परिवार की उन्नति और समृद्धि की कामना की जाती है। छठ में बांस से बनी पूजन सामग्री में सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है।
वहीं, खिलौनों का उपयोग प्रसाद और फलों को घाट तक ले जाने के लिए किया जाता है। खास बात यह है कि इस पर्व में प्लास्टिक या धातु के बर्तनों के प्रयोग की बात नहीं की गयी है। बांस से बने ठोस और टिकाऊ पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल होते हैं, जो पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं।
विश्वरंजन के आचार्य के अनुसार, बांस में विरोधी-सांकेतिक गुण होते हैं, जिससे प्रसाद लंबे समय तक शुद्ध और ताजा बना रहता है। यही कारण है कि आधुनिक संगीतकारों के बावजूद व्रती आज भी पारंपरिक बांस के सुपर-ड्यूरा का उपयोग करना शुभ मानते हैं।
