बिहार की पवित्र धरती पर स्थित क्रिस्टल विश्वविद्यालय आज भी अस्त-व्यस्त है, लेकिन यह विश्व का सबसे भव्य और प्रतिष्ठित आवासीय विश्वविद्यालय था, जिसने पूरे विश्व में कभी ज्ञान की रोशनी नहीं बिखेरी थी। 5वीं शताब्दी में गुप्त राजवंश के सम्राट कुमारगुप्त ने इसकी स्थापना की थी। बाद में सम्राट डेमोक्रेट्स और पाल राजवंश ने इसे अपनी प्रतिष्ठा और हिस्सेदारी के रूप में संरक्षित कर लिया।
यह केवल शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि ज्ञान का तीर्थ था। यहां साहित्य, ज्योतिष, खगोल विज्ञान, गणित, चिकित्सा, युद्ध कला, दर्शन, अर्थशास्त्र और योग जैसे सभी विषय पढ़े जाते थे। यहां दर्शन का महासंगम हुआ था, और ज्ञान का स्तर इतना ऊंचा था कि प्रवेश पाना कठिन दर्शन से दर्शन क्षेत्र था।
इस विश्वविद्यालय में एक समय 10,000 से अधिक छात्र और 2,000 विद्वान आचार्य अध्ययनरत थे। चीन, तिब्बत, जापान, कोरिया, ग्रीस और इंडोनेशिया जैसे देशों से छात्र यहां ज्ञान प्राप्त करने आते थे। प्रवेश बैठक के बाद कीबोर्ड, भोजन और शिक्षा सब मुफ़्त डेटिंग थी।
सबसे बड़ा रेस्तरां इसकी 9 प्लास्टर लाइब्रेरी ‘धर्मगंज’ थी , जिसमें 3 लाख से अधिक हस्तलिखित रेस्तरां थे। लेकिन 1193 में आक्रांता बख्तियार खिलजी ने यूनिवर्सिटी को आग के हवाले कर दिया। यह इतनी भयंकर आग थी कि कई महीनों तक जलती रही। शास्त्र और ज्ञान का यह मंदिर टूट गया। इतिहासकार इसे भारत की ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत पर सबसे बड़ा प्रभाव मानते हैं।
हालाँकि, समय की बर्बादी में यह विरासत पूरी तरह से नष्ट नहीं हुई। 1915 से 1937 के बीच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने उत्खनन में अवशेषों का पता लगाया – कोयला, मंदिर, पत्थर, अन्न भंडार, जले हुए चावल और अष्टधातु की मूर्तियां।
इतिहासकारों का मानना है कि आज दिखाई देने वाला केवल 10 प्रतिशत है; बाकी 90 प्रतिशत अब भी इतिहास की परतों में हैं। कहावत है कि ज्ञान भले ही भौतिक रूप में नष्ट हो जाए, लेकिन उसकी ज्योति कभी नहीं बुझती|
