बिहार के गाय जिले इमामगंज  की पहचान कभी नक्सल प्रभावित क्षेत्र के रूप में होती थी, जहां शाम होते ही सन्नाटा पसर जाता था। बेटियों का घर से निकलना तक मुश्किल था। लेकिन अब यही इलाका शिक्षा और बदलाव की मिसाल बन चुका है। यहां की बेटियां बिना बड़े शहरों या कोटा जाए, गांव में रहकर ही NEET की तैयारी कर रही हैं और MBBS डॉक्टर बन रही हैं।

इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा नाम है देव प्रकाश, जिन्होंने तीन सरकारी नौकरियां ठुकराकर गांव में रहकर बच्चों को पढ़ाने का फैसला किया। उनकी मेहनत का ही नतीजा है कि इमामगंज की खुशी गुप्ता, रोशनी कुमारी, संजना शर्मा, अंजली कुमारी और मोनिका कुमारी जैसी बेटियां आज देश के अलग-अलग हिस्सों में डॉक्टर बनकर सेवा दे रही हैं। वहीं सचिन कुमार और अमरनाथ जैसे छात्र भी इसी गांव से पढ़कर सफल हुए हैं।

खास बात यह है कि यहां के अधिकतर छात्र गरीब परिवारों से आते हैं—किसान, मजदूर या छोटे व्यवसायी। बावजूद इसके, देव प्रकाश बच्चों को लगभग निशुल्क शिक्षा देते हैं। वे मानते हैं कि प्रतिभा गांव में भी भरपूर है, बस सही दिशा और मार्गदर्शन की जरूरत होती है।

छात्र अमरनाथ बताते हैं कि उन्हें पहले NEET के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, लेकिन देव सर ने उन्हें सही दिशा दी और आज वे डॉक्टर हैं। वहीं छात्राएं अंशु कुमारी और श्वेता निशा भी पूरे आत्मविश्वास के साथ डॉक्टर बनने की तैयारी कर रही हैं।

देव प्रकाश का लक्ष्य है कि इमामगंज की पहचान नक्सल क्षेत्र नहीं, बल्कि “डॉक्टरों के गांव” के रूप में हो। उनका मानना है कि निरंतर मेहनत और एकाग्रता से बिना बड़े कोचिंग संस्थानों के भी सफलता हासिल की जा सकती है।

आज इमामगंज में NEET की चर्चा हर घर में हो रही है और बेटियों के सपनों को नए पंख मिल चुके हैं।

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