ईसाई: मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव का असर अब भारत के शहरों तक साफ दिखने लगा है। प्लास्टिक प्लांट प्रभावित होने के कारण प्लास्टिक में कॉमर्शियल एलपीजी उद्यमों की गहरी छाप पड़ रही है। बिहार के होटलों में यह संकटग्रस्त होटल और रेस्तरां संस्थान बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं, जहां आधुनिक रसोई अब पारंपरिक चूल्हों की ओर जाने को मजबूर हो गए हैं।
मूर्ति के प्रसिद्ध होटल राधे-राधे और राजस्थान के होटल भी इस संकट से घिरे नहीं हैं। यहां गैस की कमी के लिए अब लकड़ी और सिलेंडर के चूल्हों पर खाना बनाया जा रहा है। होटल संचालक आनंद शंकर कुमार का कहना है कि गैस के पासपोर्ट बंद हो गए हैं, इसलिए जबरन वैकल्पिक समाधान करना पड़ रहा है। हालाँकि, इस प्रक्रिया में समय और मेहनत दोनों ज्यादा लग रहे हैं।
उन्होंने बताया कि पहले उनके यहां करीब 200 तरह के मिठाइयां और कच्चे माल के सामान तैयार होते थे, लेकिन अब गैस की कमी के कारण मेन्यू को सीमित कर दिया गया है। मिठाइयाँ भी अब पारंपरिक चूल्हों पर बनाई जा रही हैं, जिससे उत्पादन क्षमता प्रभावित हो रही है।
इस संकट का सबसे ज्यादा असर छोटे इलेक्ट्रॉनिक्स और स्ट्रीट वेंडर्स पर पड़ा है। बड़े होटल किसी भी तरह के विकल्प ढूंढ रहे हैं, लेकिन छोटे लैपटॉप की दुकान के सामने बंद करने की नौबत आ गई है। लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाने में दोगुना समय लग रहा है और लकड़ी के चूल्हे का खर्चा भी बढ़ गया है। वहीं, इलेक्ट्रिक चूल्हों के इस्तेमाल से बिजली बिल ने अपनी परेशानी बढ़ा दी है।
गैस की कमी का असरदार प्रोजेक्ट भी दिख रहा है। पहले की तुलना में खाने के विकल्प कम हो गए हैं और लोगों का सबसे ज्यादा इंतजार किया जा रहा है। साथ ही, स्वाद और क्वालिटी में भी फर्क महसूस हो रहा है।
होटल उद्योग की आधिकारिक पासपोर्ट सूची में कर्मचारियों की भर्ती पर भी संकटमोचन चल रहा है। कई विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर हालात जल्दी ठीक नहीं हुए, तो उन्हें स्टाफ कम करना पड़ सकता है।
गैस संकट को उजागर करने वाली गैस संकट से अब हजारों लोगों की रोजी-रोटी प्रभावित हो रही है। यदि जल्दबाज़ी सामान्य नहीं हुई, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।
