जमुई से सिविक इश्यू की इस ग्राउंड रिपोर्ट में हम आपको दिखा रहे हैं उस सड़क की हकीकत, जिसे कभी इलाके की लाइफलाइन कहा जाता था, लेकिन आज यह ‘डेथ ट्रैप’ बन चुकी है।
यह सड़क जमुई मुख्यालय को गिद्धौर और खैरा प्रखंड से जोड़ती है। साल 2020-21 में करीब 9 किलोमीटर लंबी इस सड़क का निर्माण किया गया था, लेकिन महज पांच साल में इसकी हालत इतनी खराब हो चुकी है कि अब यहां सड़क कम और गड्ढे ज्यादा नजर आते हैं।
ग्राउंड पर पहुंची टीम को पूरे रास्ते में बमुश्किल 1 किलोमीटर ही सही सड़क मिली, बाकी हिस्से गड्ढों, मिट्टी और बालू में तब्दील हैं। हालात ऐसे हैं कि वाहनों के साथ-साथ पैदल चलना भी मुश्किल हो गया है।
इस सड़क पर गरसंडा, बालाडीह, सोनपे, बानपुर, दाविल, चांगोडीह, हरिहरपुर समेत दो दर्जन से ज्यादा गांवों के हजारों लोग रोजाना सफर करते हैं। लेकिन बरसात के समय स्थिति और भी भयावह हो जाती है। एम्बुलेंस तक समय पर नहीं पहुंच पाती।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि सड़क निर्माण के कुछ ही समय बाद इसकी गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे थे। ऊपर से कोलूहा चौक और बानपुर के पास बने बालू स्टॉक पॉइंट ने स्थिति को और बदतर बना दिया। भारी ट्रकों के दबाव से सड़क पूरी तरह धंस गई।
ग्रामीण मंशूर खां बताते हैं कि कई बार गड्ढों में हिचकोले खाते वाहन में ही महिलाओं का प्रसव हो गया, जिसमें नवजात की जान तक नहीं बच पाई। वहीं अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने से डरते हैं, क्योंकि हादसे का खतरा हर वक्त बना रहता है।
यह सड़क सिर्फ स्थानीय आवागमन ही नहीं, बल्कि झारखंड जाने का एक अहम शॉर्टकट भी थी। इसके खराब होने से अब लोगों को 13 से 15 किलोमीटर लंबा रास्ता तय करना पड़ रहा है, जिससे समय और खर्च दोनों बढ़ गए हैं।
सरकार की गड्ढा मुक्त सड़क की घोषणा के बावजूद जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। लोगों में प्रशासन के खिलाफ आक्रोश है, लेकिन फिलहाल उनके पास इस खतरनाक रास्ते पर चलने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
