बिहार के जिलों से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो मानवता, आस्था और भाईचारे की मिसाल पेश करती है। यहां रामनवमी के लिए दशकों से मुस्लिम परिवार के कलाकार महावीरी झंडे तैयार कर रहे हैं, वो भी पूर्ण श्रद्धा और पवित्रता के साथ।

मोहम्मद रशीद पिछले 58 वर्षों से महावीरी झंडा बना रहे हैं। 70 साल से ज्यादा उम्र होने के बावजूद उनकी मेहनत और लगन आज भी याद है। राशिद के कर्मचारी हैं कि झंडा फहराने का समय वे पूरी तरह से स्वर्ण मंदिर का ध्यान रखते हैं, क्योंकि यह आस्था से काम करता है। उनके बनाए झंडे बिहार के कई सजावटी के अलावा यूपी के मुगल रेस्तरां और झारखंड के डेकोरमा, कोडरमा तक भेजे जाते हैं।

वहीं 85 साल मोहम्मद रायल्स करीब 70 साल पुराने इस काम में लगे हैं। उनके परिवार में 100 साल से भी अधिक समय से महावीरी झंडे बने हुए हैं। वे लटके हुए झंडों के साथ लैस-पटाका की तस्वीरें देते हैं। यह काम करने से उन्हें सार्वभौम और खुशियाँ मिलती हैं, और वे साल भर रामनवमी का इंतजार करते हैं।

ये कलाकार 3 फीट से लेकर 45 फीट तक के झंडे गाड़ रहे हैं। झंडे की कीमत उसके आकार और मेहनत के अनुसार तय होती है—छोटे झंडे 100 रुपये से शुरू होते हैं, जबकि बड़े झंडों की कीमत हजारों में होती है। हर साल हजारों झंडों के ऑर्डर तैयार हो जाते हैं।

नूर मोहम्मद जैसे कलाकारों का कहना है कि इस काम में उन्हें किसी तरह का भेदभाव महसूस नहीं होता। उनके लिए सभी लोग भाईचारे से जुड़े हुए हैं और यही उनकी रोजी-रोटी का जरिया भी है।

आज जब समाज में बंटवारे की बातें होती हैं, तो ये गंगा-जमुनी तहजीब की एक जीवंत मिसाल पेश कर रहे हैं। उनका काम यह संदेश देता है कि वास्तविक शक्ति एकता में है और आस्था किसी भी धर्म की सीमा में बंधी नहीं है।

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