बिहार के गया जिले के कोहवरी जंगल में एक अनोखा गुरुकुल संचालित हो रहा है, जहां शिक्षा का तरीका पारंपरिक स्कूलों से बिल्कुल अलग है। इस गुरुकुल को अनिल और रेखा नामक दंपती पिछले कई वर्षों से चला रहे हैं। वर्ष 2017 में शुरू हुए इस प्रयास ने उस इलाके में शिक्षा की नई रोशनी जगाई, जहां पहले अशिक्षा का बोलबाला था।
प्राकृतिक वातावरण के बीच पेड़ों के नीचे और झोपड़ियों में चलने वाली कक्षाएं इस गुरुकुल की खास पहचान हैं। यहां बच्चे सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि खेती-किसानी, खाना बनाना, क्राफ्ट और कला जैसे जीवन कौशल भी सीखते हैं। गुरुकुल में सीनियर छात्र जूनियर बच्चों को पढ़ाते हैं, जिससे उनमें आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता का विकास होता है।
इस गुरुकुल की एक और विशेषता है पर्यावरण संरक्षण। अनिल और रेखा ने परिसर के आसपास 4,000 से अधिक पेड़ लगाए हैं और करीब 100 प्रकार के पारंपरिक बीजों को संरक्षित किया है। यहां बच्चों को जैविक खेती, देसी बीजों का महत्व और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने की शिक्षा दी जाती है।
गुरुकुल में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे गरीब परिवारों से आते हैं। यहां फीस के रूप में केवल एक किलो चावल लिया जाता है, और वह भी अनिवार्य नहीं है। बच्चे मिलकर खेतों में काम करते हैं, फसल उगाते हैं और रसोई में भोजन भी तैयार करते हैं। उनके भोजन में मोटे अनाज यानी मिलेट्स को प्राथमिकता दी जाती है।
अनिल और रेखा, जो पहले दिल्ली में नौकरी करते थे, अब गांव लौटकर शिक्षा के इस मिशन में जुटे हैं। उनका उद्देश्य बच्चों का सर्वांगीण विकास करना है, ताकि वे केवल किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन के हर पहलू में सक्षम बन सकें।
यह गुरुकुल आज एक मिसाल बन चुका है, जहां शिक्षा के साथ संस्कार, प्रकृति और आत्मनिर्भरता का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
