गया से एक बड़ी खबर सामने आ रही है, जहां एलपीजी की कमी के कारण लोगों की रसोई पर सीधा असर पड़ा है। देश में जितनी एलपीजी की खपत हो रही है, उतनी आपूर्ति नहीं हो पा रही है। सप्लाई चेन प्रभावित होने और अंतरराष्ट्रीय तनाव के चलते हालात और बिगड़ते दिख रहे हैं। ऐसे में सरकार वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर केरोसिन को फिर से बढ़ावा देने पर विचार कर रही है।

सरकार ने केरोसिन वितरण को लेकर अस्थायी छूट भी दी है, जिससे अब यह पीडीएस के साथ-साथ पेट्रोल पंपों पर भी उपलब्ध कराया जा सकता है। इसका असर बाजार में साफ दिखने लगा है। केरोसिन स्टोव की मांग अचानक बढ़ गई है, लेकिन सप्लाई कम होने के कारण बाजार में स्टोव लगभग आउट ऑफ स्टॉक हो चुके हैं। जहां मिल भी रहे हैं, वहां उनकी कीमत 1700 से 5000 रुपये तक पहुंच गई है, जबकि पहले यही स्टोव 400-600 रुपये में मिल जाते थे।

गांवों और कस्बों में लोग मजबूरी में फिर से स्टोव या कोयले-लकड़ी के चूल्हे पर लौट रहे हैं। गया के कई इलाकों में परिवारों ने एलपीजी खत्म होने के बाद पुराने स्टोव की मरम्मत कर उसे दोबारा इस्तेमाल में लाना शुरू कर दिया है। गृहणियों का कहना है कि गैस सिलेंडर महंगा और समय पर उपलब्ध नहीं हो रहा, जिससे यह कदम उठाना पड़ रहा है।

हालांकि, डॉक्टर और विशेषज्ञ इस बदलाव को लेकर चिंतित हैं। उनका कहना है कि केरोसिन स्टोव से निकलने वाला धुआं स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक होता है, जिससे सांस, आंख और फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

इधर, जिला प्रशासन का कहना है कि केरोसिन की आपूर्ति केवल घरेलू उपयोग के लिए की जाएगी और डिपो को स्टॉक बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। फिलहाल सरकार के पास सीमित अवधि का एलपीजी स्टॉक मौजूद है और लोगों से अपील की गई है कि वे घबराकर बुकिंग न करें।

कुल मिलाकर, एलपीजी संकट ने लोगों को एक बार फिर पुराने ‘केरोसिन युग’ की याद दिला दी है, जो मजबूरी तो है, लेकिन कई चुनौतियां भी साथ लेकर आया है।

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